क्यों मिनी बैटल ग्राउंड बन गई है असम की बराक घाटी?

अब जब दो दिनों बाद असम में चुनाव होने जा रहे हैं सूबे की बराक घाटी कुछ ज्यादा ही गर्म है। गर्माहट भी ऐसी कि थोड़ा सा पुलिसिया तंत्र कमजोर पड़ जाए तो घाटी में रहने वाले लोग आपस में ही भिड़ जायें और कोई बड़ा हादसा हो जाए। लेकिन अभी तक सब शांत है। संभव है शांत रहेगा भी।

लेकिन जिस अंदाज में राज्य का यह इलाका चुनावी राजनीति के केंद्र में आया है, बीजेपी और कांग्रेस पशोपेश में हैं। कोई भी पार्टी निश्चित रूप से नहीं कह सकती कि घाटी का यह इलाका किसे जीत दिलाएगा और किसे हारने पर मजबूर करेगा।

याद रहे असम विधानसभा चुनाव में जहां ब्रह्मपुत्र घाटी पारंपरिक रूप से सत्ता का केंद्र मानी जाती रही है, वहीं इस बार बराक घाटी अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। कछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिलों को मिलाकर बनी यह घाटी न केवल भौगोलिक रूप से अलग है, बल्कि भाषा, संस्कृति और राजनीतिक झुकाव के लिहाज से भी असम के बाकी हिस्सों से भिन्न पहचान रखती है। यही कारण है कि चुनाव के दौरान यहां के मुद्दे पूरे राज्य की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं।

बराक घाटी की चर्चा का सबसे बड़ा कारण इसका “निर्णायक स्वभाव” है। यहां की 15 विधानसभा सीटें संख्या में भले कम हों, लेकिन करीबी मुकाबले में ये सत्ता की दिशा तय कर सकती हैं। इस बार यहां चुनावी विमर्श तीन प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित है—पहचान, घुसपैठ और राजनीतिक वफादारी।

घाटी में बंगाली भाषी हिंदू और मुस्लिम आबादी का प्रभाव है, जिससे यहां की राजनीति हमेशा से संवेदनशील रही है। भाजपा जहां असमिया अस्मिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को उभार रही है, वहीं कांग्रेस स्थानीय पहचान और सामाजिक संतुलन की बात कर रही है। इस टकराव ने बराक घाटी को “मिनी बैटल ग्राउंड” बना दिया है।

घुसपैठ का मुद्दा असम की राजनीति में नया नहीं है, लेकिन बराक घाटी में यह अधिक जटिल रूप ले लेता है। भाजपा लगातार यह आरोप लगाती रही है कि बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ ने यहां की जनसांख्यिकी को प्रभावित किया है। एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून जैसे मुद्दों को इसी संदर्भ में उठाया जाता है। हालांकि, जमीनी स्तर पर स्थिति इतनी सीधी नहीं है।

बराक घाटी के कई स्थानीय संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि “घुसपैठ” का राजनीतिक इस्तेमाल अक्सर वैध नागरिकों को भी संदेह के घेरे में खड़ा कर देता है। खासकर बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय खुद को इस बहस का सबसे बड़ा शिकार मानता है।यानी, घुसपैठ का मुद्दा पूरी तरह काल्पनिक नहीं है, लेकिन इसका चुनावी उपयोग कई बार वास्तविकता से अधिक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन जाता है।

ऐतिहासिक रूप से देखें तो बराक घाटी कांग्रेस के लिए एक मजबूत आधार रही है। आजादी के बाद से लेकर लंबे समय तक कांग्रेस ने यहां अपनी पकड़ बनाए रखी। इसकी वजह थी स्थानीय नेताओं की मजबूत पकड़ और बंगाली भाषी समुदाय के साथ उसका जुड़ाव।हालांकि, पिछले एक दशक में भाजपा ने इस समीकरण को चुनौती दी है। खासकर 2016 और 2021 के चुनावों में भाजपा ने यहां उल्लेखनीय बढ़त हासिल की, जिसका श्रेय संगठन विस्तार और हिंदू बंगाली वोटों के ध्रुवीकरण को दिया गया।

फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि बराक घाटी पूरी तरह भाजपा के कब्जे में नहीं है। कांग्रेस आज भी यहां एक मजबूत दावेदार बनी हुई है, खासकर उन इलाकों में जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक हैं।

पिछले दो चुनाव में बीजेपी को बढ़त दिलाने वाली यह घाटी इस बार बीजेपी को डरा रही है। बीजेपी को लग रहा है कि अगर बराक घाटी से उसे धोखा मिला तो सत्ता की कुर्सी जा सकती है और ऐसा हुआ तो खेल ख़राब हो सकता है। यही वजह है कि बीजेपी नेता अमित शाह बार -बार बराक घाटी का दौरा करते रहे और अपने वोटर को समझाते भी रहे और चेतावनी भी देते रहे। जाहिर है भाजपा इस बार बराक घाटी को लेकर अधिक सतर्क और रक्षात्मक नजर आ रही है। इसके पीछे कई कारण हैं।

पहला, सीएए  का मुद्दा। भाजपा ने जिस कानून को अपने राजनीतिक एजेंडे का अहम हिस्सा बनाया, वही बराक घाटी में मिश्रित प्रतिक्रिया का कारण बन गया। जहां हिंदू बंगाली समुदाय के एक हिस्से ने इसका समर्थन किया, वहीं मुस्लिम समुदाय और कई नागरिक संगठनों ने इसका विरोध किया। दूसरा, स्थानीय असंतोष। बेरोजगारी, बाढ़ प्रबंधन, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा जैसे मुद्दे यहां के मतदाताओं के बीच गूंज रहे हैं।

भाजपा की सरकार होने के बावजूद इन समस्याओं का समाधान अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया, जिससे असंतोष बढ़ा है। और तीसरा, विपक्ष का एकजुट होना। इस बार कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर अपने संगठन को मजबूत किया है और कुछ क्षेत्रों में अन्य दलों के साथ तालमेल भी बैठाया है। इससे मुकाबला पहले से अधिक कड़ा हो गया है।

इस बार बराक घाटी में कांग्रेस निश्चित रूप से भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। पार्टी ने अपने पारंपरिक वोट बैंक—अल्पसंख्यक और कुछ हद तक बंगाली हिंदू मतदाताओं—को फिर से संगठित करने की कोशिश की है।इसके अलावा, कांग्रेस इस बार केवल पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं है। वह स्थानीय मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं—को प्रमुखता से उठा रही है। यह रणनीति उसे उन मतदाताओं के करीब ला रही है जो “ध्रुवीकरण” से थक चुके हैं।

हालांकि, कांग्रेस के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व का अभाव और संसाधनों की कमी अब भी उसकी राह में बाधा हैं। इसके बावजूद, बराक घाटी में उसकी वापसी की संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यहां घुसपैठ, पहचान, विकास और राजनीतिक वफादारी जैसे मुद्दे आपस में उलझे हुए हैं।भाजपा के लिए यह क्षेत्र अपनी पकड़ बनाए रखने की परीक्षा है, तो कांग्रेस के लिए यह खोई जमीन वापस पाने का मौका। चुनाव परिणाम चाहे जो हों, इतना तय है कि बराक घाटी का फैसला असम की सत्ता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। यह क्षेत्र एक बार फिर साबित कर रहा है कि छोटे भूगोल भी बड़ी राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।

9 तारीख को जब मतदान होंगे तो बराक घाटी की तरफ न सिर्फ असमी जनता की नजरें होंगी। चुनाव के बाद जब परिणाम आएंगे तो बराक ने किसे अपनाया और किसे दुत्कारा का पता चलेगा। जिसे बराक घाटी अपनाएगी, संभावना है कि सत्ता उसके पास होगी और जिसे बराक घाटी जमींदोज करेगी उसकी आगे की राजनीति बेहद कमजोर होगी। बीजेपी और कांग्रेस की असली चुनौती यही है। 

(अखिलेश अखिल पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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